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                                                                                                                   क्या सामान्य है आपका बच्चा ?

                                                             

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   क्या सामान्य है आपका बच्चा ?

             जन्म के साथ ही शिशु के भीतर शारीरिक एवं मानसिक विकास की जटिल प्रक्रिया शुरू हो जाती है। यह निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है जो कि शिशु के आनुवशिंक, सामाजिक, आर्थिक, भौगोलिक परिस्थितियों के अनुसार परिवर्तित होती है। इसके अतिरिक्त पारिवारिक परिस्थितियां जैसे कि सदस्यों के बीच आपसी सामंजस्य, भावनात्मक संबंध, आर्थिक स्थिति, खानपान, रहन-सहन आदि भी महत्वपूर्ण घटक है। आपका बच्चा स्वस्थ है या नहीं, बच्चे का विकास  सामान्य  है या नहीं, इन सभी बातों की जानकारी दे रहे है, होम्योपैथी विशेषज्ञ डाॅ. मिकीन जैन। उन्होंने बताया कि बच्चे के विकास की निम्न प्रक्रियाएं डेवलेपमेंटल माईल-स्टोन्स के रूप में चिन्हित की गई हैं। वजन एवं ऊंचाई - यह बहुत हद तक आनुवांशिक एवं पारिवारिक घटक पर निर्भर करता है, जवन एवं ऊँचाई का सही माप आवश्यक हैं। अलग-अलग बच्चों की ग्रोथ भिन्न- भिन्न होती हैं।

 


Dr.Mikin Jain was a
Co-Chairperson at

"State level Homeopathy Workshop"

Organised by Health Department of India.

Clinic Timings

Monday - Friday
Morning

11.00 a.m to 1.30 p.m.

Evening

6.00 p.m to 9.00 p.m


Residential Address Timings:-

Morning upto 11.00 a.m
Evening 4.00 p.m to 6.00 p.m

On every saturday & sunday
By Appoinment only.



 


 वजन एवं ऊँचाई   
       18 वर्ष की उम्र तक कभी भी बढ़ सकती है, अतः इसकी आवश्यक चिंता करने की बजाय यह सुनिश्चित करें कि आपका ँचाई 18 वर्ष की उम्र तक कभी भी बढ़ सकती है, अतः इसकी आवश्यक चिंता करने की बजाय यह सुनिश्चित करें कि आपका ँचाई 18 वर्ष की उम्र तक कभी भी बढ़ सकती है, अतः इसकी आवश्यक चिंता करने की बजाय यह सुनिश्चित करें कि आपका ँचाई 18 वर्ष की उम्र तक कभी भी बढ़ सकती है, अतः इसकी आवश्यक चिंता करने की बजाय यह सुनिश्चित करें कि आपका बच्चा ऊर्जावन, बीमारियों से रहित एवं एक्टिव हो।

दांतो का निकलना (डेन्टीनेषन) -
          
यह बच्चे के विकास का भरोसेमंद मानदंड नहीं है। सामान्यतः यह छह महीने के आसपास प्रारंभ होता है। वैसे कुछ बच्चों में यह जन्म से केवल 14 महीने तक कभी भी प्रारंभ होता है। दांत आने के लक्षणों में है चिड़चिड़ेपन का बढ़ जाना मुंह में अधिक लार का बनना एवं दर्द की वजह से बच्चे का रोना। स्पीच- यह दो प्रकार की होती है। छह महीने पहले नाॅन वर्बल स्पीच होता है। इसमें बच्चा अर्थहीन आवाज करता है। दूसरा सात महीने और उसके बाद शिशु जीभ की मदद से बोलना प्रारंभ करता है। स्पीच डेवलेपमेंट में बच्चा परिवार के सदस्यों की नकल कर उनकी तरह मुंह बनाने की कोशिश करता हैं।

मल-मूत्र त्याग पर नियंत्रण -
            कई बच्चों में युरीनेशन की फ्रिकवेंशी अलग-अलग होती है। रा़ित्र में बिस्तर पर पेशाब करना अथवा कपड़ों में मल त्याग देना, अभिभावकों की आम परेशानी है। वस्तुतः पूर्ण रूप से मल त्याग पर नियंत्रण 2.6 से 3.6 वर्ष तक की आयु से हो जाता हैं। इसके बाद भी उक्त समस्या का बने रहना बच्चे की मानसिक अथवा भावनात्मक जरूरतों के पूरा न हो पाने की वजह से हो सकता है।

असामान्य व्यवहार

  • बच्चे का बहुत अधिक रोना मूल रूप से उसकी उचित देखभाल न हो पाने का नतीजा हैं।

  •  यदि बच्चा आपके प्यार के लिए से रहा हो तो उसे गोद में उठाने और प्यार करने से वह कभी नहीं बिगड़ता।

  • यदि आप अपने शिशु को प्रारंभिक 2-3 वर्षों में जितना कम स्लाएंगे, बच्चे का भविष्य उतना ही सुखद एवं खुशनुमा होगा। पर इसका अर्थ यह नहीं कि आप बच्चे को जिद्दी बन जाने दें। बस्तुतः यदि आप एक समझदार अभिभावक है, जो अपनी बात शिशु तक खेल-खेल में धैर्यपूर्वक एवं सरल भाषा में पहुंचा सकते हैं। ऐसा करने पर आपके शिशु को आंसू बहाने की जरूरत बहुत कम पड़ती हैं।

  • बच्चे की असामान्य हरकतें जैसे कि सिर पटकना, स्वयं को शारीरिक नुकसान पहुंचाना आदि टेम्पर-टैन्ट्रम कहलाता है। इसका मूलभूत कारण बच्चे के भीतर स्वाभिमान का विकास होना हैं।

टेम्पर-टैन्ट्रम से बचने के उपाय -
             टेम्पर-टैन्ट्रम को संभालने का सर्वोत्तम तरीका होता है उसे नजर अंदाज करना । इस दौरान किसी भी किस्म का गुस्सा, चिंता, भय, बहंस आदि अभिव्यक्त नहीं करना चाहिए।

होम्योपैथी किस प्रकार है कारगर  
            बढ़ते हुए बच्चों की समस्याओं, जैसे डेन्टीनेशन के साथ होने वाली तकलीफें- दस्त, उल्टी, बुखार, आदि बच्चों का देर से बोलना, हकलाना, रात्रि में बिस्तर पर पेशाब करना, कब्ज, बच्चों का बहुत अधिक मिट्टी खाना, व्यवहार संबंधी समस्याए , हायपर एक्टिविटी आदि समस्याओं के लिए होम्योपैथी अत्यंत कारगर हैं। होम्योपैथी दवाएं कैल्क्रेरिया-कार्बस्ट्रामोनियम, ट्यूबरक्यूलिनम, मेडोराइनम आदि दवांए लक्षणों के आधार पर जब दी जाती है, तो उसका बच्चे के सर्वांगीण विकास में सकारात्मक प्रभाव पड़ता हैं।

हम से होम्योपैथिक उपचार की जरूरत मरीजों - दमा, गठिया, आत्मकेंद्रित, बांझपन, PCOD, दूध एलर्जी, IHD, एआर, एमआर, यूके, सिर दर्द, अनिद्रा आदि जैसे कोई पुरानी बीमारी, के लिए
 

 

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