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 नई दुनिया,हेल्थ ,रायपुर ,मार्च 2008।                                                                                                           अस्थमा

 

 

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   45 वर्षीय एक सज्जन गत तीन वर्षो से दमा की समस्या से पीडि़त थे। उन्हें अमूमन रोज ही दिन में 3-4 बार इनहेलर लेना पड़ता था। उन्हें कई वर्षों से सर्दी, छीकें आना, खाँसी आदि की समस्या थी, जिसके लिए वो अपने फैमिली डाॅक्टर से एलोपैथी चिकित्सा लेते थे। पिछले तीन वर्षो से उन्हें सर्दी एवं खाँसी के साथ में साँस लेने में तकलीफ होना तथा छाती में से सीटी जैसी आवाज आने की समस्या प्रारंभ होने लगी, जिसके लिए चिकित्सकीय परामर्श करने पर उन्हें अस्थमा नाकम बीमारी का होना तय किया गया । इसके लिए उन्हें अस्थालीन नामक इनहेलर लेने की सलाह दी गई जो वर्तमान समय में उन्हें दिन में 3-4 बार लेने की आवश्यकता थी । इस दौरान उन्होंने होम्योपैथी चिकित्सा का निश्चय किया। केस लेने पर हमने पाया कि उनके पिताजी तथा भाई को भी यही समस्या थी। इसके अतिरिक्त पाचन संबंधित समस्या थी, जो दमा के साथ अधिक हो जाती थी।

 

 


Dr.Mikin Jain was a
Co-Chairperson at

"State level Homeopathy Workshop"

Organised by Health Department of India.

Clinic Timings

Monday - Friday
Morning

11.00 a.m to 1.30 p.m.

Evening

6.00 p.m to 9.00 p.m


Residential Address Timings:-

Morning upto 11.00 a.m
Evening 4.00 p.m to 6.00 p.m

On every saturday & sunday
By Appoinment only.


 

 हमने नक्स वोमिका नामक दवा से इलाज शुरू किया तथा बीच-बीच में नेट्रस-सल्फ नाम दवा का प्रयोग आनुवांशिक प्रभव को दूर करने के लिए किया । केस लेने पर हमने पाया कि उनके पिताजी तथा भाई को भी यही समस्या थी। इसके अतिरिक्त पाचन संबंधित समस्या थी, जो दमा के साथ अधिक हो जाती थी। हमने नक्स वोमिका नामक दवा से इलाज शुरू किया तथा बीच-बीच में नेट्रस-सल्फ नाम दवा का प्रयोग आनुवांशिक प्रभाव को दूर करने के लिए किया। ये सज्जन पिछले 10 माह से मेरे संपर्क में है तथा पिछले 3 माह से उन्हें इनहेलर की कोई आवश्यकता नहीं है। दवाओं के अतिरिक्त हमने उन्हें कुछ फेफड़े के व्यायाम भी नियमित रूप से करने की सलाह दी थी जिनमें गुब्बारे फुलना, मोमबत्ती को फूँक से बुझाना आदि शामिल थे।

दमा रोगी इन बातों का ध्यान रखें

  • बिस्तर पर बिछाई जाने वाले चादर व तकिये के खोल के प्रत्ये सप्ताह साफ करें।
  • गलीचे, चटाई आदि को समय-समय पर साफ करें।
  • घर के परदे आदि को प्रत्येक 15 दिन पर साफ करें।
  • बच्चों को जहाँ तक हो सके रूई आदि से बने खिलौने (साॅफ्ट टाॅयज) ना दें। यदि हो तो उनमें सफाई का विशेष ध्यान रखें।
  • पराग कण एवं फंगस से बचाव हेतु ध्यान रखें कि सर्दियों में प्रातः काल परागकणों की संख्या बहुत अधिक होती है अतः यदि अति आवश्यक न हो तो इस मौसम में सुबह धूप निकलने से पहले घर से न निकले इनसे बचाव हेतु कमरे में खिड़की दरवाजे बंद रखें।
  •  धुम्रपान से बचें। ना आप स्वयं इसका सेवन करें ना ही सेवन करने वाले के पास जाएँ।
  •  सर्दी, खाँसी आदि श्वसन तंत्र संबंधित इन्फेक्शन का शीघ्र एवं उचित इलाज करें।
  • कुछ दवाएँ खास तौर पर दर्द निवारक (एनएसएआईडी, एस्पीरिन आदि) का प्रयोग करने से दमा की तकलीफ बढ़ती हैं।
   होम्योपैथी किस तरह कारगर है

        अस्थमा में होम्योपैथी एवाएँ अत्यंत प्रभावी पाई गई है। ये मुख्य रूप से श्वसन तंत्र की अति संवेदनशीलता को कम कर उसे सामान्य स्तर पर लाने का कार्य करती हैं। फलस्वरूप व्यक्ति अपने आसपास के वातावरण जिसमें वायु प्रदूषक तथा एलर्जन्स उपस्थित होते है, से प्रभावी रूप से समन्वय स्थापित करता है। इससे ना सिर्फ जीवन स्तर में सुधार आता है बल्कि कार्य की क्षमता बढ़ जाती है।

अस्थमा में प्रमुख होम्यों दवाएँ मुख्यतः तीन प्रकार की होती हैं

  • एक्यूट दवाएँ: ये दवाएँ अटैक के समय मरीज को देने पर साँस लेने की तकलीफ, कफ आदि में आराम मिलता है। इसके आर्सेनिक अल्ब, पल्सेटीला, कार्बो-वेज आदि दवाएँ लक्षणों के आधार पर दी जाती हैं।
  • काॅन्सटीट्यूषनल दवाएँ:- ये दवाएँ शरीर की प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाकर दमे की पुनरावृत्ति को रोकती है। ये दवाएँ है काॅली कार्ब, कैलकेरिया कार्ब, लाइकोपोडियम आदि। इनका चुनाव व्यक्ति में समानता के आधार पर किया जाता है।
  • इन्टर करेंट दवाएँ:- ये दवाएँ अनुवांशिक प्रभाव को कम करने हेतु दी जाती है ये दवाएँ है थूजा मेडोरायनम, नैट्रम सल्फ आदि।
हम से होम्योपैथिक उपचार की जरूरत मरीजों - दमा, गठिया, आत्मकेंद्रित, बांझपन, PCOD, दूध एलर्जी, IHD, एआर, एमआर, यूके, सिर दर्द, अनिद्रा आदि जैसे कोई पुरानी बीमारी, के लिए
 

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